उम्मीद रियाद! पाक बोला – या हबीबी, झोली भर दो वरना खजाना बैठ जाएगा

Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

मिडिल ईस्ट की जंग ने सिर्फ मिसाइलों को नहीं, कई देशों की अर्थव्यवस्था को भी हिला दिया है। सबसे ज्यादा झटका उस मुल्क को लगा है जो पहले से ही आर्थिक ICU में पड़ा था।

अब हालात ऐसे हैं कि Pakistan ने फिर वही पुराना दरवाजा खटखटाया है। फर्क बस इतना है कि इस बार दस्तक में एक अजीब सी बेबसी है, जैसे कोई गुनगुना रहा हो: “भर दे झोली मेरी या हबीबी…”

खाली खजाना और रियाद की ओर नजर

भारी आर्थिक दबाव और विदेशी मुद्रा संकट के बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर Saudi Arabia से वित्तीय मदद की अपील की है।

इस्लामाबाद चाहता है कि रियाद उसके पास जमा 5 अरब डॉलर की अल्पकालिक राशि को 10 साल के दीर्घकालिक कर्ज में बदल दे। यह कदम पाकिस्तान को फिलहाल सांस लेने की मोहलत दे सकता है, क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार लगातार दबाव में है।

तेल भी उधार, भुगतान भी बाद में

सिर्फ कर्ज ही नहीं, पाकिस्तान ने तेल आपूर्ति को लेकर भी बड़ी मांग रखी है। इस्लामाबाद चाहता है कि सऊदी अरब स्थगित भुगतान तेल सुविधा को 1.2 अरब डॉलर से बढ़ाकर 5 अरब डॉलर तक कर दे। सरल शब्दों में कहें तो अभी तेल ले लिया जाए और भुगतान बाद में किया जाए, ताकि देश का ऊर्जा संकट थोड़ा शांत हो सके।

IMF के साथ कठिन बातचीत

इस समय पाकिस्तान International Monetary Fund के साथ 7 अरब डॉलर के राहत पैकेज की तीसरी समीक्षा में उलझा हुआ है।

आईएमएफ की सख्त शर्तें पूरी करना आसान नहीं है। इसी वजह से पाकिस्तान ने अपने सहयोगियों से अतिरिक्त वित्तीय सहारा तलाशना शुरू कर दिया है।

प्रवासी धन से नई तरकीब

पाकिस्तान ने एक और दिलचस्प योजना भी पेश की है। इस्लामाबाद चाहता है कि विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानी नागरिकों द्वारा भेजे गए करीब 10 अरब डॉलर के रेमिटेंस का सिक्योरिटाइजेशन किया जाए। इसका मतलब यह कि भविष्य में आने वाले पैसे के आधार पर अभी बाजार से पूंजी जुटाई जाए।

निवेश की गुहार भी साथ

कर्ज और तेल के अलावा पाकिस्तान ने निवेश की भी अपील की है। इस्लामाबाद ने सऊदी अरब के Public Investment Fund से पाकिस्तान में नए निवेश अवसर तलाशने की गुजारिश की है।

अगर ऐसा होता है तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है, जो फिलहाल गंभीर दबाव में है।

आर्थिक कूटनीति अक्सर बड़े मंचों पर गंभीर भाषा में लिखी जाती है, लेकिन जमीनी सच्चाई कभी-कभी बहुत सीधी होती है। जब खजाना खाली हो और कर्ज का पहाड़ सामने खड़ा हो, तब अंतरराष्ट्रीय रिश्ते अचानक दोस्ती से ज्यादा जरूरत बन जाते हैं।

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